कामना
लिख पाऊँ ना प्रेम तो कोई बात नहीं पर
हे प्रभु हिय में नफ़रत वाले भाव न देना।
बल बाहों में हो ना हो तिरने को नदिया।
बीच धार डूबे जो ऐसी नाव न देना।।
झरे न मधु वाणी से कोई बात नहीं पर
ना हों अंगारों सी जलती शब्दावलियाँ।
करना ना करना प्रहरी मृदु कुंजों का पर।
भ्रमर न करना,देख जिसेडर जाएँ कलियाँ।।
जप-तप हो ना हो सुरत्व की प्राप्ति भले ही,
मानव हूँ मानव बस मुझको रहने देना ।
सत्पथ पर पीड़ाओं के उपहार मिलेंगे।
असत् जन्य सुख नहीं सत्य दुख सहने देना।।
दैहिक दैविक भौतिक आदि सुखों की इच्छा।
पनपे तो पनपे पर ऐसी चाह न पनपे।
औरों के उत्कर्ष और सुख को कर ज्वाला,
जले स्वयं का हृदय कभी वह डाह न पनपे।।
कह ले कोई बात चार तो कह ले लेकिन
बात -बात आपा खोने का ताव न देना।
दिखें न जो पर रिसे निरंतर ही नयनों से।
चिरनिद्रा देना पर ऐसे घाव न देना।।
बल बाँहों में हो ना हो तिरने को नदिया।
बीच धार डूबे जो ऐसी नाव न देना।।