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कविताएँ · 23/10/2026

कामना

लिख पाऊँ ना प्रेम तो कोई बात नहीं पर हे प्रभु हिय में नफ़रत वाले भाव न देना। बल बाहों में हो ना हो तिरने को नदिया। बीच धार डूबे जो ऐसी नाव न देना।। झरे न मधु वाणी से कोई बात नहीं पर ना हों अंगारों सी जलती शब्दावलियाँ। करना ना करना प्रहरी मृदु कुंजों का पर। भ्रमर न करना,देख जिसेडर जाएँ कलियाँ।। जप-तप हो ना हो सुरत्व की प्राप्ति भले ही, मानव हूँ मानव बस मुझको रहने देना । सत्पथ पर पीड़ाओं के उपहार मिलेंगे। असत् जन्य सुख नहीं सत्य दुख सहने देना।। दैहिक दैविक भौतिक आदि सुखों की इच्छा। पनपे तो पनपे पर ऐसी चाह न पनपे। औरों के उत्कर्ष और सुख को कर ज्वाला, जले स्वयं का हृदय कभी वह डाह न पनपे।। कह ले कोई बात चार तो कह ले लेकिन बात -बात आपा खोने का ताव न देना। दिखें न जो पर रिसे निरंतर ही नयनों से। चिरनिद्रा देना पर ऐसे घाव न देना।। बल बाँहों में हो ना हो तिरने को नदिया। बीच धार डूबे जो ऐसी नाव न देना।।